Saturday, 9 June 2018

एक्जिमा (Eczema, Ekjima)



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एक्जिमा क्या है 
एक्जिमा (Eczema) एक्जिमा यानिउकवतको आयुर्वेद में कुष्ठ के ही अन्तर्गत माना गया है। यह चर्मरोग शरीर के किसी भी भाग पर हो सकता है। एक्जिमा दो प्रकार का होता है|

1.
बहता हुआ गीला उकवत
2.
सूखा उकवत (Dry Eczema)
एक्जिमा के लक्षण : eczema
1–  यह रोग अधिकतर सिर में कानों के पास, गर्दन पर तथा अँगुलियों में होता है। त्वचा पर यह मूंग या उड़द की दाल जितने आकार से लेकर कई इंच तक स्थान घेर सकता है।
2- 
जहाँ पर यह रोग होता है, वहाँ पर लालिमा छाई रहती है तथा रोगाक्रान्त त्वचा कठोर और शुष्क हो जाती है और उसमें सूजन भी जाती है।
3- 
रोग की उग्रता में रोगाक्रान्त स्थान पर खुजली उठती है और जलन होती है एवं कभी-कभी वहाँ से द्रव भी रिसने लग जाता है। बहता हुआ उकवत ही बहुधा पुराना पड़कर सूखे उकवत का रूप धारण कर लेता है।
4- 
चमड़ी खुजलाते रहने से छिलती रहती है और पर्त उधड़-उधड़ कर गिरती रहती है।
एक्जिमा के कारण : eczema
1- जिन लोगों का रक्त विषाक्त होता है एवं जिनके शरीर में पुरानी गन्दगी होती है, उन्हीं लोगों को यह रोग होता है।
2- 
इसके अतिरिक्त उत्तेजक साबुन का प्रयोग करने से |
3- 
कच्चे रंग का वस्त्र पहनने से |
4 –
गन्दा मौजा इस्तेमाल करने से |
5– 
रंग, पॉलिश, सोड़ा एवं गन्धक आदि वस्तुओं का व्यवसाय या धन्धा करने से भी इस रोग के होने की संभावनाएँ रहती हैं
6-
डायबिटीज, अपच, गठिया आदि रोगों के उपद्रव के रूप में भी प्रायः यह रोग होता है, जिनके दूर हो जाने पर यह रोग भी स्वतः चला जाता है।
7- 
जिन बच्चों को अपनी माँ का दूध कम अथवा बिल्कुल नहीं मिलता या अस्वच्छ दूध पिलाया जाता है, उन्हें भी यह रोग अक्सर लग जाता है। ऐसे बच्चों को साफ दूध पर रखते हुए फलों का रस पिलाने से उकवत से छुटकारा दिलाया जा सकता है।
8-
उकवत पुराना पड़ जाने पर कई अन्य कठिन रोगों जैसे-नेत्ररोग, श्वासरोग आदि की सृष्टि कर सकता है।
एक्जिमा का आयुर्वेदिक उपचार: ekjima
1- पुनर्नवा (साठी) की जड़ 125 ग्राम को सरसों के तैल में मिलाकर पीसें। फिर 50 ग्राम सिन्दूर मिलाकर मरहम तैयार करलें इस मरहम को कुछ दिन लगाने से एक्जिमा (चम्बल) जड़मूल से नष्ट हो जाता है। शर्तिया दवा है

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2- सरसों के तैल 50 ग्राम में थूहर (सेंहुड़) का डन्डा रखकर खूब गरम करें जब थूहर जल जाए तब जले हुए डन्डे को बाहर फेंक दें और तैल को शीशी में सुरक्षित रखलें एक्जिमा (चम्बल) को नीम के क्वाथ से धोकर फुरैरी से यह तैल दोनों समय लगायें पुराने से पुराना एक्जिमा 1 सप्ताह में नष्ट हो जाता है।
3- लालकत्था, काली मिर्च, नीला थोथा और बकरी की पशम (उम्दा और नरम ऊन) सभी को समभाग लेकर सूक्ष्म पीसकर मिलाकर रखलें दाद या चम्बल सूखा हो तो उसे खद्दर के मोटे तौलिए से इतना खुजला लें कि रक्त जैसा निकलने लगे (लाललाल हो जाए) तदुपरान्त गाय का मक्खन 101 बार का धुला हुआ लगाकर ऊपर से इस चूर्ण को बुरक दें यदि दाद या खाज गीला हो तो उसे खुजलाने की आवश्यकता नहीं है, वैसे ही मक्खन लगाकर चूर्ण बुरक दिया करें। इस प्रयोग से पुराने से पुराना दाद और चम्बल जड़ से मिटता है
4-तारकोल और कड़वा तैल दोनों समभाग लेकर आग पर गरम कर लें। जब खदक पड़ने लगे तब उतार कर शीशी में भर लें इसे एक्जिमा पर सुबहशाम लगायें, 3-4 दिन रोग बढ़ा हुआ सा प्रतीत होगा, फिर ठीक हो जाएगा।
5- चाल मोंगरा के तैल का सेवन करने से प्रायः सभी प्रकार के चर्म रोग (खाज, खुजली, चकते, बद, कण्ठमाला, कुष्ठ, सफेद दाग, नासूर, दाद इत्यादि) ठीक हो जाते हैं इसे खाया भी जाता है और लगाया भी जाता है।
एक्जिमा रोग का प्राकृतिक इलाज : ekjima
1-  प्रति सप्ताह एक दिन का उपवास केवल जल पीकर और एनिमा लेकर करें।
2- 
शीघ्र लाभ हेतु और पुराने उकवत में एक से तीन सप्ताह के उपवास की आवश्यकता पड़ सकती है, किन्तु 3 दिन के उपवास से ही रोग की तीव्रता कम हो जाती है उपवास के बाद 2-3 दिनों तक फलों के रस पर रहना चाहिए। फिर दो सप्ताह तक फल और उबली हुई तरकारियों पर नमक का इस्तेमाल बन्द रखना चाहिए। उसके बाद दूध, फल और मेवों पर कुछ दिनों तक रहकर धीरे-धीरे सादे भोजन पर आना चाहिए।
3- 
फिर भी रोग जब तक जड़ से जाए, भोजन में फल, दूध, मेवा और तरकारियों आदि क्षारधर्मी खाद्यों की अधिकता रखनी चाहिए।
4- 
उकवत के रोगी को ढाई-तीन लीटर साफ-स्वच्छ जल कम-से-कम प्रतिदिन पीना चाहिए और जब तक कब्ज टूटे तब तक एनिमा लेते रहना चाहिए तथा रोगी को कपड़े कम-से-कम पहनना चाहिए
5– 
गर्मी के दिनों में 2-3 बार स्नान करना चाहिए तथा स्नान के पहले और बाद में अपनी हथेलियों से सारे शरीर को रगड़कर लाल कर देना चाहिए तथा रोगाक्रान्त भाग को रगड़ से बचाए रखना चाहिए।
6-  
दिन में कम-से-कम 2 बार गंगा नदी अथवा किसी अन्य नदी या तालाब के किनारे की गीली मिट्टी सारे बदन में लपेटकर आधा या 1 घण्टे तक धूप में सुखाकर नदी के पानी में खूब मल-मलकर स्नान कर लेना चाहिए। उसके बाद हरे रंग की बोतल के सूर्यतप्त नारियल के तेल से सारे बदन की मालिश धूप में बैठकर या लेटकर करानी चाहिए। इसी तेल को उकवत पर भी लगाना चाहिए।
7-
उकवत पर भीगे कपड़े की गद्दी रखकर महीने में एक बार वाष्पस्नान तथा दो बार पूरे शरीर की गीली चादर की लपेट देना चाहिए
8-
प्रतिदिन रात को पेडू पर गीली मिट्टी की पट्टी लगाकर सोना चाहिए। प्रतिदिन 2-3 बार उकवत को 3-4 मिनट तक भाप से सेंक कर नमकीन जल से धोकर उस पर गीली मिट्टी की उष्णपट्टी लगानी चाहिये |

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Friday, 8 June 2018

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Sunday, 3 June 2018

वंशलोचन (Banslochan, Tabasheer, Tabashir)

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वंशलोचन शरीर की धातुओं को बढ़ाता है और वीर्य की मात्रा में वृद्धि करता है। यह धातु को पुष्ट करता है। यह स्वादिष्ट और ठंडा होता है, प्यास को रोकता है। यह खांसीबलगमबुखार, पित्त, खून की खराबी और सफेद दाग को दूर करता है। यह फोड़ा-फुन्सियों और पाण्डु (पीलिया) रोगों को दूर करता है। यह हृदय और आमाशय को बलवान बनाता है। प्यास को रोकता है तथा पित्त से होने वाले खूनी दस्तों को दूर करता है। यह उन्माद (पागलपन) और गर्मी के बुखार में लाभ देता है। 10 ग्राम वंशलोचन, 10 ग्राम भूनी हुई फिटकरी और 10 ग्राम पिसी हुई मिश्री का चूर्ण बनाकर खांसी के लिए बहुत ही लाभदायक होता है। यह छोटे-छोटे बच्चों की खांसी जो कफ को थूक नहीं सकते हैं तथा खांसते-खांसते बेहोश हो जाते हैं। उनके लिए यह चूर्ण बहुत ही लाभकारी होता है। इसे बच्चों को आयु के अनुसार आधा ग्राम तक दे सकते हैं।


विभिन्न रोगों मे सहायक :

1. दमा : 20 ग्राम पीपल और 20 ग्राम वंशलोचन  को पीसकर 2 ग्राम की मात्रा में शहद में मिलाकर सुबह-शाम देने से दमा का रोग दूर हो जाता है।

2. दांत निकलना : दांत निकलते समय बच्चे को वंशलोचन और शहद मिलाकर चटाने से दांत सुन्दर निकलते हैं और दांतों का दर्द भी खत्म हो जाता है।

3. खांसी  :
  • वंशलोचन एक ऐसा द्रव्य है जो अनेक योगों में प्रयुक्त होता है। बहुत सी प्रसिद्ध औषधियां इसके योग से बनती हैं। खांसी और सांस के रोग में इससे ज्यादा लाभ उठाया जा सकता है। खांसी अगर सूखी हो तो आधा ग्राम वंशलोचन शहद के साथ मिलाकर चाटने से दूर हो जाती है। सांस के रोग में भी वंशलोचन बहुत लाभकारी होता है। आधे ग्राम तक वंशलोचन के चूर्ण में 1 चुटकी पीपल का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ देने से पूरा लाभ मिलता है।
  • 1 से ढाई ग्राम वंशलोचन के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर खाने से सूखी खांसी ठीक हो जाती है।
4. गर्भ की रक्षा : आधा ग्राम वंशलोचन पानी या दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से गर्भपात नहीं होगा और गर्भशक्तिशाली बनता है। इससे गर्भवती स्त्री और बच्चे का स्वास्थ्य ठीक रहता है।

5. मुंह के छाले :
  • मुंह के छाले में वंशलोचन के साथ शहद मिलाकर लगाने से मुंह के छालों में आराम रहता है।
  • हल्दी व वंशलोचन को एक साथ पीसकर मुंह के छाले पर लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं।
6. स्त्रियों का प्रदर रोग :
  • 50 ग्राम वंशलोचन को पीसकर 50 ग्राम चीनी में मिलाकर इसे 5-5 ग्राम कच्चे दूध और पानी से सुबह-शाम सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है।
  • 50-50 ग्राम की मात्रा में वंशलोचन, नागकेसर, छोटी इलायची को लेकर पीस लें। इसमें 100 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिला लें। इसमें से 1-1 चम्मच सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है।
7. यकृत का बढ़ना :
  • 1.5 ग्राम वंशलोचन को शहद के साथ मिलाकर रोगी को चटाकर खिलाने से यकृत (जिगर) वृद्धि में बहुत लाभ होता है।
  • 120 मिलीग्राम की मात्रा में असली वंशलोचन बच्चे को सुबह-शाम दूध या शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता हैं।
  • 120-120 मिलीग्राम वंशालोचन, पपीता और चिरायता का चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से यकृत वृद्धि में बहुत फायदा होता है।
8. वीर्य रोग में :
  • 30 ग्राम वंशलोचन और 3 ग्राम छोटी इलायची को पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम घी और चीनी में मिलाकर लेने से वीर्य के रोग दूर होते हैं।
  • 60 ग्राम वंशलोचन को पीस लें। इसमें 40 ग्राम चीनी मिला लें। इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम दूध से लेते रहने से वीर्य रोग में लाभ होता है।

9. हाथ-पैरों की जलन : 1 ग्राम वंशलोचन को शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से हाथ-पैरों की जलन शान्त हो जाती है।
10. बालरोग : 120 मिलीग्राम पिसा हुआ वंशलोचन शहद में मिलाकर सुबह रोगी को चटाने से खांसी ठीक हो जाती है।

Friday, 1 June 2018

मुलेठी बहुत गुणकारी औषधि है। मुलेठी के प्रयोग करने से न सिर्फ आमाशय के विकार बल्कि गैस्ट्रिक अल्सर के लिए फायदेमंद है।

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मुलेठी

मुलेठी बहुत गुणकारी औषधि है। मुलेठी के प्रयोग करने से न सिर्फ आमाशय के विकार बल्कि गैस्ट्रिक अल्सर के लिए फायदेमंद है। इसका पौधा 1 से 6 फुट तक होता है। यह मीठा होता है इसलिए इसे ज्येष्ठीमधु भी कहा जाता है। असली मुलेठी अंदर से पीली, रेशेदार एवं हल्की गंधवाली होती है। यह सूखने पर अम्ल जैसे स्वाद की हो जाती है। मुलेठी की जड़ को उखाड़ने के बाद दो वर्ष तक उसमें औषधीय गुण विद्यमान रहता है। ग्लिसराइजिक एसिड के होने के कारण इसका स्वाद साधारण शक्कर से पचास गुना अधिक मीठा होता है।

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मुलेठी के गुण –
– यह ठंडी प्रकृति की होती है और पित्त का शमन करती है .

– मुलेठी को काली-मिर्च के साथ खाने से कफ ढीला होता है। सूखी खांसी आने पर मुलेठी खाने से फायदा होता है। इससे खांसी तथा गले की सूजन ठीक होती है।- अगर मुंह सूख रहा हो तो मुलेठी बहुत फायदा करती है। इसमें पानी की मात्रा 50 प्रतिशत तक होती है। मुंह सूखने पर बार-बार इसे चूसें। इससे प्‍यास शांत होगी।

– गले में खराश के लिए भी मुलेठी का प्रयोग किया जाता है। मुलेठी अच्‍छे स्‍वर के लिए भी प्रयोग की जाती है।

– मुलेठी महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है। मुलेठी का एक ग्राम चूर्ण नियमित सेवन करने से वे अपनी सुंदरता को लंबे समय तक बनाये रख सकती हैं।

– लगभग एक महीने तक , आधा चम्मच मूलेठी का चूर्ण सुबह शाम शहद के साथ चाटने से मासिक सम्बन्धी सभी रोग दूर होते है.

– फोड़े होने पर मुलेठी का लेप लगाने से जल्दी ठीक हो जाते है.

– रोज़ ६ ग्रा. मुलेठी चूर्ण , ३० मि.ली. दूध के साथ पिने से शरीर में ताकत आती है.

– लगभग ४ ग्रा. मुलेठी का चूर्ण घी या शहद के साथ लेने से ह्रदय रोगों में लाभ होता है.

– इसके आधा ग्राम रोजाना सेवन से खून में वृद्धि होती है.

– जलने पर मुलेठी और चन्दन के लेप से शीतलता मिलती है.

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– इसके चूर्ण को मुंह के छालों पर लगाने से आराम मिलता है.

– मुलेठी का टुकड़ा मुंह में रखने से कान का दर्द और सूजन ठीक होता है.


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– उलटी होने पर मुलेठी का टुकडा मुंह में रखने पर लाभ होता है.

– मुलेठी की जड़ पेट के घावों को समाप्‍त करती है, इससे पेट के घाव जल्‍दी भर जाते हैं। पेट के घाव होने पर मुलेठी की जड़ का चूर्ण इस्‍तेमाल करना चाहिए।

– मुलेठी पेट के अल्‍सर के लिए फायदेमंद है। इससे न केवल गैस्ट्रिक अल्सर वरन छोटी आंत के प्रारम्भिक भाग ड्यूओडनल अल्सर में भी पूरी तरह से फायदा करती है। जब मुलेठी का चूर्ण ड्यूओडनल अल्सर के अपच, हाइपर एसिडिटी आदि पर लाभदायक प्रभाव डालता है। साथ ही अल्सर के घावों को भी तेजी से भरता है।

– खून की उल्टियां होने पर दूध के साथ मुलेठी का चूर्ण लेने से फायदा होता है। खूनी उल्‍टी होने पर मधु के साथ भी इसे लिया जा सकता है।

– हिचकी होने पर मुलेठी के चूर्ण को शहद में मिलाकर नाक में टपकाने तथा पांच ग्राम चूर्ण को पानी के साथ खिला देने से लाभ होता है।

– मुलेठी आंतों की टीबी के लिए भी फायदेमंद है।
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– ये एक प्रकार की एंटीबायोटिक भी है इसमें बैक्टिरिया से लड़ने की क्षमता पाई जाती है। यह शरीर के अन्‍दरूनी चोटो में भी लाभदायक होती है।

– मुलेठी के चूर्ण से आँखों की शक्ति भी बढ़ती है सुबह तीन या चार ग्राम खाना चाहिये।

– यदि भूख न लगती हो तो एक छोटा टुकड़ा मुलेठी कुछ देर चूसे, दिन में ३,४ बार इस प्रक्रिया को दोहरा ले ,भूख खुल जाएगी 

– कोई भी समस्या न हो तो भी कभी-कभी मुलेठी का सेवन कर लेना चाहिए आँतों के अल्सर ,कैंसर का खतरा कम हो जाता है तथा पाचनक्रिया भी एकदम ठीक रहती है .

पुनर्नवा का चूर्ण (एक ऐसी औषधि जो करती है बहुत सारे रोगों से लड़ने में मदद)

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इस पोस्ट में हम आपके लिए एक ऐसे पौधे के चूर्ण के बारे में जानकारी लेकर आये हैं जिसके सेवन से शरीर में बहुत सारे रोग दम तोड़ देते हैं। यह कैंसर के साथ साथ जल्दी बुढ़ापे को भी नहीं आने देता है। इस पौधे का नाम है पुनर्नवा। पुनर्नवा का अभिप्राय है यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। 

पुनर्नवा का चूर्ण भी एक ऐसी औषधि है जो बहुत सारे रोगों से लड़ने में मदद करती है। पुनर्नवा स्वाद में कड़वा, तीखा, कसैला और खारा होता है। यह वायु, कफ, सूजन, ख़ासी, बवासीर, पांडुरोग का नाश करता है।केवल रोग निवारक औषधि ही नहीं है यह शक्तिदायक औषधि भी है।
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आइये जानते हैं पुनर्नवा के औषधीय फायदों के बारे में:-


1.पीलिया रोग में:-

पीलिया के रोग में आँखे तथा शरीर की त्वचा का रंग बदल कर पीला हो जाता है, मूत्र में पीलापन, ज्वर तथा कमज़ोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। पीलिया से पीड़ित लोगों के लिए पुनर्नवा बहुत कारगर होता है। इसका 2 चम्मच रस सुबह-शाम भोजन के बाद शहद से रोजाना सेवन करने से और पुनर्नवा की जड़ के 108 टुकड़ों से बनी माला को गले में धारण करने से पीलिया के रोग में लाभ होता है। इसके अलावा पुनर्नवा के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) के 10-20 मिलीलीटर रस में हरड़ का 2-4 ग्राम चूर्ण मिलाकर पीने से पीलिया रोग कम हो जाता है।

2.खून की कमी दूर करे:-

पुनर्नवा का चूर्ण एनीमिया से पीड़ित लोगों के लिए बहुत कारगर होता है। पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण, मुनक्का और हल्दी को बराबर मात्रा में पीसकर 1 चम्मच की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम 1 कप दूध के साथ सेवन करने से खून की कमी के रोग में लाभ होता है।

3. हृदय रोग में:-

हृदय रोगियों के लिए पुनर्नवा का चूर्ण बहुत लाभदायक होता है। पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण और सूखे पत्तों के चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर 1 चम्मच की खुराक में रोजाना सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करें। इससे दिल के अनेक रोगों में लाभ होता है।

4.हमेशा जवां बनाये रखे:-

आयुर्वेद के अनुसार इस पौधे में यह क्षमता है कि इसके सेवन से व्यक्ति अपने आप को पुनः जवान बना सकता है।कहते हैं इसे सेवन से बुढ़ापे में भी मनुष्य को जवान जैसी एनर्जी लगती है। पुनर्नवा की ताजी जड़ का रस 2 चम्मच एवं पुनर्नवा चूर्ण को मुनक्के के साथ 2-3 माह तक नियमित सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति भी युवा की तरह महसूस करता है। इसके अलावा पुनर्नवा को रोजाना 1 चम्मच खाने के साथ या फिर सब्जी में मिलाकर खाने से बुढ़ापा नहीं आता यानी कि बूढ़ा व्यक्ति भी जवां बना रहता है क्योंकि इससे शरीर के सभी अंगों में नई कोशिकाओं का निर्माण होता रहता है। 20 ग्राम पुनर्नवा को रोजाना दूध के साथ 6 महीने तक लगातार पीने से भी मनुष्य की उम्र बढ़ती है।

5.किडनी की पथरी को खत्म करे:-

पुनर्नवा का सेवन किडनी को साफ करने के साथ साथ किडनी में पथरी की समस्या को भी खत्म करता है। किडनी में पथरी होने पर पुनर्नवा के पौधे का काढ़ा बनाए और रोजाना इसे पियें।

6.खून को साफ करे:-

पुनर्नवा रक्तशोधन में उपयोग किया जाता है। यह रक्त से विषैले पदार्थों को दूर कर कई रोगों को नष्ट कर देता है।

7.जोड़ों के दर्द में:-

पुनर्नवा का उपयोग जोड़ों के दर्द से निजात दिलाता है। यह किसी भी तरह के आर्थराइटिस में उपयोगी साबित होता है। 1 ग्राम पुनर्नवा की जड़ के पाउडर को अदरक और कपूर के साथ मिला कर काढ़ा बना कर 7 दिनों के लिए उपयोग करें। इससे जोड़ों के दर्द में आराम मिलेगा।

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8.कमजोरी दूर करे:-

पुनर्नवा शरीर को ऊर्जा देता है। यह मांसपेशियों को मज़बूत कर कमज़ोरी और दुबलापन दूर करता है।

9.पाचन तंत्र को ठीक रखे:-

पुनर्नवा पेट से जुडी बीमारियों को दूर करता है। आँतों में ऐठन, अपच और पेट में ज़रूरी अम्लों की कमी जैसे रोगों में यह जल्द आराम दिलाता है।

10.त्वचा रोगों के लिए:-

किसी भी प्रकार के त्वचा संबंधी रोगों के लिए भी पुनर्नवा काफी फायदेमंद होता है। इसके जड़ को तेल के साथ गर्म करके मालिश करें। चर्म रोग जैसे दाग, धब्बे, छाई , चोट के निशान आदि पर पुनर्नवा के जड़ को पीस कर लेप बनाकर लगाएं। कुछ ही दिनों में आप रोग को दूर होता पाएंगे।

11.कैंसर होने से बचाए:-

ये कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की सबसे अद्भुत औषधि है क्यूँकि ये नयी कोशिकाएँ बनाती है। ये नयी कोशिकाएँ कैन्सर से लड़ने में शक्ति प्रदान करती है।

12.आखों के रोग:-

पुनर्नवा की जड़ को गुलाबजल में घिसकर रोजाना सोते समय आंखों में लगाने से आंखों के अनेक रोग दूर होकर नज़र में सुधार होता है। पुनर्नवा के पत्तों का रस 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार शहद के साथ आंखों के रोगों में प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा पुनर्नवा की जड़ों को पीसकर शहद में मिलाकर काजल की तरह लगाने से आंख की लाली ठीक हो जाती है।

नहीं बनेगी पत्थरी (स्टोन) अगर खाएंगे कुल्थी


नहीं बनेगी पत्थरी (स्टोन) अगर खाएंगे कुल्थी।

कई लोगो को अक्सर ही (पत्थरी) स्टोन की समस्या आम ही रहती हैं। बार बार ऑपरेशन करवाने के बाद भी उनको ये समस्या दोबारा हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता हैं क्युकी उनका शरीर भोजन द्वारा ग्रहण किये हुए कैल्शियम को पचा नहीं पाता। और किडनी भी शरीर की गंदगी की सफाई करते समय इसको साफ़ करने में असक्षम हो जाती हैं और यही से ये हमारे मूत्राशय को भी प्रभावित करती हैं।

कुल्थी – प्राकृतिक पत्थरी नाशक।
गुर्दे से जुड़ी कई समस्याएं हैं, मसलन गुर्दे में दर्द, मूत्र में जलन या मूत्र का अधिक या कम आना आदि।
इन्हीं समस्याओं में से एक समस्या, जिसके पीडि़तों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वह है किडनी में पथरी।
आयुर्वेद व घरेलू चिकित्सा में किडनी की पथरी में कुलथी को फायदेमंद माना गया है। गुणों की दृष्टि से कुल्थी पथरी एवं शर्करानाशक है। वात एवं कफ का शमन करती है और शरीर में उसका संचय रोकती है। कुल्थी में पथरी का भेदन तथा मूत्रल दोनों गुण होने से यह पथरी बनने की प्रवृत्ति और पुनरावृत्ति रोकती है। इसके अतिरिक्त यह यकृत व पलीहा के दोष में लाभदायक है। मोटापा भी दूर होता है।
250 ग्राम कुल्थी कंकड़-पत्थर निकाल कर साफ कर लें। रात में तीन लिटर पानी में भिगो दें। सवेरे भीगी हुई कुल्थी उसी पानी सहित धीमी आग पर चार घंटे पकाएं।
जब एक लिटर पानी रह जाए (जो काले चनों के सूप की तरह होता है) तब नीचे उतार लें। फिर तीस ग्राम से पचास ग्राम (पाचन शक्ति के अनुसार) देशी घी का उसमें छोंक लगाएं। छोंक में थोड़ा-सा सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हल्दी डाल सकते हैं। पथरीनाशक औषधि तैयार है।
आप दिन में कम-से-कम एक बार दोपहर के भोजन के स्थान पर यह सारा सूप पी जाएं। 250 ग्राम पानी अवश्य पिएं।
एक-दो सप्ताह में गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है, लगातार सेवन करते रहना राहत देता है।
यदि भोजन के बिना कोई व्यक्ति रह न सके तो सूप के साथ एकाध रोटी लेने में कोई हानि नहीं है।

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गुर्दे में सूजन की स्थिति में जितना पानी पी सकें, पीने से दस दिन में गुर्दे का प्रदाह ठीक होता है।
यह कमर-दर्द की भी रामबाण दवा है। कुल्थी की दाल साधारण दालों की तरह पका कर रोटी के साथ प्रतिदिन खाने से भी पथरी पेशाब के रास्ते टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है। यह दाल मज्जा (हड्डियों के अंदर की चिकनाई) बढ़ाने वाली है।
कुल्थी का पानी भी लाभदायक
कुल्थी का पानी विधिवत लेने से गुर्दे और मूत्रशय की पथरी निकल जाती है और नयी पथरी बनना भी रुक जाता है। किसी साफ सूखे, मुलायम कपड़े से कुल्थी के दानों को साफ कर लें। किसी पॉलीथिन की थैली में डाल कर किसी टिन में या कांच के मर्तबान में सुरक्षित रख लें।
कुल्थी का पानी बनाने की विधि:
किसी कांच के गिलास में 250 ग्राम पानी में 20 ग्राम कुल्थी डाल कर ढक कर रात भर भीगने दें। प्रात: इस पानी को अच्छी तरह मिला कर खाली पेट पी लें। फिर उतना ही नया पानी उसी कुल्थी के गिलास में और डाल दें, जिसे दोपहर में पी लें। दोपहर में कुल्थी का पानी पीने के बाद पुन: उतना ही नया पानी शाम को पीने के लिए डाल दें।

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इस प्रकार रात में भिगोई गई कुल्थी का पानी अगले दिन तीन बार सुबह, दोपहर, शाम पीने के बाद उन कुल्थी के दानों को फेंक दें और अगले दिन यही प्रक्रिया अपनाएं। महीने भर इस तरह पानी पीने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी धीरे-धीरे गल कर निकल जाती है।
इसके साथ ये सहायक उपचार भी करे।

कुल्थी का कुछ समय तक नियमित सेवन करने से पथरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। यह मूत्रमार्ग में पथरी, मूत्र में क्रिस्टल आना, मूत्र में जलन आदि में दी जाती है।https://indianjadibooti.com

मालकांगनी के फायदे


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आयुर्वेदिक मतानुसार मालकांगनी रस में कटु, तिक्त, गुण में तीक्ष्ण, स्निग्ध, प्रकृति में गर्म, विपाक में कटु, कफ़ और वात नाशक, वमनकारक, अग्निवर्द्धक, बुद्धि और स्मरणशक्तिवर्द्धक होती है। यह पक्षाघात, संधिवात, बेरी-बेरी, कास-श्वास, मूत्र रोग, खुजली, अर्श, नपुंसकता, दाद, व्रण, सफेद दाग, शोथ, स्मृति की कमी में गुणकारी है। यह अफीम खाने की आदत छुड़ाने की एक उत्तम औषधि है।
मालकांगनी के विभिन्न रोगों में प्रयोग और घरेलु उपचार
1. सफेद दाग होने पर मालकांगनी का प्रयोग
2. अफीम की आदत छुड़ाने के लिए मालकांगनी का का सेवन
3. दाद पर लगाये मालकांगनी
4. खूनी बवासीर में मालकांगनी का इस्तेमाल
5. खुजली में लगाये मालकांगनी
6. बेरी-बेरी रोग में मालकांगनी का सेवन
7. दमा, श्वास के रोग में मालकांगनी का सेवन

Best Quality Malkangni


8. नपुंसकता में मालकांगनी का सेवन
9. बुद्धि और स्मृति बढ़ाने के लिए मालकांगनी का सेवन करे
10. अनिद्रा में मालकांगनी का सेवन
11. नेत्र ज्योति बढ़ाने के लिए मालकांगनी का प्रयोग
12. दुर्बलता में में लीजिये मालकांगनी
13. सिर दर्द में मालकांगनी का सेवन

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